तू संभलती नाव सा...
है घनी धूप, तू धूप में ठंडी छाँव सा। लहरों से डरती में, तू संभलती नाव सा। मुसीबत जब जब आए और दिल उदास हो जाए, पहाड़ सी मुसीबतों में खड़ी तू ठंडी वाव सा। देती ज़िंदगी घाव कई, हिस्सा जिसका दर्द, दर्द में भी प्यारा लगे; तू ऐसे घाव सा। बदनसीब हु शायद, जीती ना एक भी बाजी मैंने, फिर भी ना हारु ज़िंदगी में, तू मेरे वो दांव सा। मिले कितने भी घाव बड़े, मरहम की जरूरत किसे? बिना मरहम के जो आ जाए, तू वो रुझाव सा। अटक जाऊं कहीं न ले पाऊं कभी कोई फैसला बिन मांगे तब मिल जाए तू वो सुझाव सा। घनी धूप में सुकून देती तू ठंडी छांव सा। लहरो से डरती मैं, तू संभलती नाव सा। ✍️ सोनल टेलर