है घनी धूप, तू धूप में ठंडी छाँव सा। लहरों से डरती में, तू संभलती नाव सा। मुसीबत जब जब आए और दिल उदास हो जाए, पहाड़ सी मुसीबतों में खड़ी तू ठंडी वाव सा। देती ज़िंदगी घाव कई, हिस्सा जिसका दर्द, दर्द में भी प्यारा लगे; तू ऐसे घाव सा। बदनसीब हु शायद, जीती ना एक भी बाजी मैंने, फिर भी ना हारु ज़िंदगी में, तू मेरे वो दांव सा। मिले कितने भी घाव बड़े, मरहम की जरूरत किसे? बिना मरहम के जो आ जाए, तू वो रुझाव सा। अटक जाऊं कहीं न ले पाऊं कभी कोई फैसला बिन मांगे तब मिल जाए तू वो सुझाव सा। घनी धूप में सुकून देती तू ठंडी छांव सा। लहरो से डरती मैं, तू संभलती नाव सा। ✍️ सोनल टेलर
हमदर्द किसी और के हुए तुम फिर भी प्रेम शेष है । दिल में सिर्फ दर्द अब फिर भी प्रेम शेष है । ढूँढ रही हूँ अब तुम्हे बीते हुए लम्हो में अब गुम हो रहे हो कहीं फिर भी प्रेम शेष है । ख्यालो में आते तो मन को छूँ जाते हो अब हमदर्द ना रहे तुम फिर भी प्रेम शेष है । संवेदना समझने वाला वेदना आखोँ की न देख पाया शिकवा उसका कैसे करें जब फिर भी प्रेम शेष है । ज़िंदगी का हमसफ़र जब आधे सफ़र छोड़ गया यादें दिल में छोड़ गया और फिर भी प्रेम शेष है ।
रंगो के इस मौसम में, शामिल कुछ प्यार करें; फिर अपने रंग में रंग दे मुझे, आज कैसा मलाल करें! रंगो की हसीन धुंध में, सजाए हसीन सपने; जानकर भी अंजान बन, तू क्यों मुझसे सवाल करें? बावरा मन मेरा राधा सा, मेरे कान्ह कहाँ तुम गुम? ढूंढ़ने में ही तुम्हें आज, फिर सुबह से शाम करें! प्यार का रंग तेरा सबसे पक्का, कच्चे रिश्ते हैं बांधे; सुन ले आज धड़कने मेरी, फिर कभी न दर- किनार करें। नैनों में सपने हज़ार लिए, फिर देखूं तेरी राह; कोई बात नहीं, तू खास है; तो हक से तेरा इंतज़ार करें।
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